ठण्ड दम तोड़ रही थी और फागुन मास में उसकी आखिरी हिचकी ज़ोरो से आयी , उस दिन स्याह बादल अचानक छत के इर्द गिर्द उमड़ने लगे , पता नहीं धूसर से ये बादल बिछोह में टूटे नज़र आ रहे थे। वो अपनी छत पर बैठा राह देख रहा था। होली में पिछले दो सालो से वो आती थी। इन्ही पलो की ऊष्मा में उसको ३६५ अँधेरी राते काटने होती थी। उसको देख भर लेने से उसके दिल की सबसे बड़ी रग में लहू वापस आ जाता था, यूँ तो साल भर खुश्क ठूंठ की तरह डोलता रहता था. रिक्शे से उतरती ही उसकी नज़र छत की किनारे पर दो खाली खुश्क आँखों पर पड़ती और उसके चेहरे पर निर्दोष मुस्कराहट की झालर जल उठती पवित्र मुस्कराहट के इसी एल्बम को वो इकठ्ठा किया जा रहा था आज तो आठ बज गए। .अँधेरे अब उसकी ज़ुल्फो से भी ज़्यादा घने हो गए थे वो नहीं आयी। .. धूसर बादलो से भी उसका दुःख देखा नहीं गया। ...उसकी नज़र ऊपर पड़ी कि बादलो की पारदर्शी आँखे छलक पड़ी अब थोड़ा सुकून था। ...उसके गाल के गीले होने की एक और वजह मिल गयी थी...